शिक्षामित्रों को 11508 भर्ती में भारांक क्यों नहीं? सुप्रीम कोर्ट का आदेश बना बड़ा सवाल | Ram Sharan Maurya Case

 

11508 शिक्षक भर्ती में शिक्षामित्रों को भारांक नहीं, तो क्या खड़ा होगा अवमानना का सवाल? सुप्रीम कोर्ट के आदेश से जुड़ा पूरा मामला समझिए

उत्तर प्रदेश में 11,508 पदों पर शुरू हुई प्राथमिक शिक्षक भर्ती ने लंबे समय बाद शिक्षामित्रों के लिए शिक्षक बनने की उम्मीद तो जगाई है, लेकिन इसी भर्ती ने एक पुराने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को फिर चर्चा में ला दिया है।

वर्तमान भर्ती के विज्ञापन में शिक्षामित्रों को आयु सीमा में छूट का लाभ दिए जाने की बात सामने आई है, लेकिन अनुभव के आधार पर भारांक (Weightage) का उल्लेख नहीं किया गया है। यही बात अब शिक्षामित्रों के बीच सबसे बड़ा सवाल बन गई है—क्या 11,508 पदों की इस भर्ती में शिक्षामित्रों को भारांक मिलना चाहिए था? और यदि नहीं दिया जाता है, तो क्या यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना मानी जा सकती है?

इस सवाल को समझने के लिए लगभग छह साल पुराने राम शरण मौर्य बनाम स्टेट ऑफ उत्तर प्रदेश मामले के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को समझना जरूरी है।




सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षामित्रों के लिए क्या कहा था?

इस पूरे मामले की जड़ जुलाई 2017 के उस फैसले तक जाती है, जिसमें शिक्षामित्रों के सहायक अध्यापक पद पर समायोजन को स्वीकार नहीं किया गया था।

लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षामित्रों की स्थिति को देखते हुए उन्हें पूरी तरह अवसर से बाहर नहीं किया। Anand Kumar Yadav मामले में कोर्ट ने कहा था कि जिन शिक्षामित्रों ने आवश्यक योग्यता हासिल कर ली है या आगे हासिल करेंगे, उन्हें अगली दो लगातार भर्तियों में शिक्षक भर्ती के लिए विचार का अवसर दिया जाए।

इसी के साथ कोर्ट ने यह भी कहा था कि इन भर्तियों में शिक्षामित्रों को उचित आयु में छूट और उनके अनुभव के लिए कुछ भारांक दिया जा सकता है।

यानी मामला केवल यह नहीं था कि शिक्षामित्र परीक्षा दे सकेंगे। उनके वर्षों के अनुभव को भी चयन प्रक्रिया में ध्यान में रखने की व्यवस्था की गई थी।

51,112 पदों का सवाल भी क्यों हो रहा है चर्चा में?

शिक्षामित्रों के इस विवाद में 51,112 रिक्त पदों का मुद्दा भी काफी महत्वपूर्ण रहा है। 69,000 शिक्षक भर्ती से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से रिक्त पदों की संख्या और आगामी भर्ती में शिक्षामित्रों के हितों को ध्यान में रखने से जुड़ी बातें सामने आई थीं। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने 18 नवंबर 2020 के अंतिम फैसले में 51,112 पदों पर भर्ती कराने का कोई सीधा आदेश नहीं दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में इतना जरूर कहा कि राज्य की ओर से दिए गए आश्वासन के अनुरूप शिक्षामित्रों को अगली चयन प्रक्रिया में एक और अवसर दिया जाए। इस अवसर को किस तरीके और किन व्यवस्थाओं के तहत दिया जाएगा, यह राज्य सरकार के विवेक पर छोड़ा गया था।

ऐसे में अब जब 11,508 पदों पर नई प्राथमिक शिक्षक भर्ती सामने आई है और इसमें शिक्षामित्रों के अनुभव के आधार पर भारांक का उल्लेख नहीं है, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यही वह “अगली चयन प्रक्रिया” है जिसका उल्लेख सुप्रीम कोर्ट ने किया था?

यदि यही भर्ती उस आदेश के अनुपालन में होने वाली अगली चयन प्रक्रिया है, तो फिर यह सवाल जरूर उठेगा कि शिक्षामित्रों को सुप्रीम कोर्ट के आदेश और राज्य सरकार के आश्वासन के अनुरूप किस प्रकार का अवसर दिया गया है।

हालांकि केवल 51,112 के बजाय 11,508 पद होने को अपने आप में कोर्ट की अवमानना कहना कानूनी रूप से जल्दबाजी होगी। अवमानना का प्रश्न इस बात पर निर्भर करेगा कि न्यायालय के आदेश का वास्तविक दायरा क्या था और वर्तमान भर्ती में राज्य सरकार ने उसका अनुपालन किस प्रकार किया है।


सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में दिया था बड़ा आश्वासन

इसके बाद मामला राम शरण मौर्य एवं अन्य बनाम स्टेट ऑफ यूपी के रूप में सुप्रीम कोर्ट के सामने आया।

इस मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से तत्कालीन Additional Solicitor General Ms. Bhati ने सुप्रीम कोर्ट के सामने कहा था कि शिक्षामित्रों को अगली चयन प्रक्रिया में एक और अवसर दिया जाएगा।

कोर्ट के रिकॉर्ड में यह बात साफ तौर पर दर्ज है। सरकार की ओर से कहा गया कि शिक्षामित्रों को अगली चयन प्रक्रिया में एक और मौका दिया जाएगा ताकि उनके साथ किसी प्रकार के पूर्वाग्रह की स्थिति न रहे।

यही वह बिंदु है जिसे आज की 11,508 शिक्षक भर्ती के संदर्भ में शिक्षामित्र संगठन और शिक्षामित्र अभ्यर्थी महत्वपूर्ण मान रहे हैं।


सुप्रीम कोर्ट ने इस आश्वासन को अपने अंतिम आदेश में भी दर्ज किया

18 नवंबर 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने Civil Appeal No. 3707 of 2020, Ram Sharan Maurya & Others Vs. State of U.P. & Others में अपना फैसला सुनाया।

फैसले के पैराग्राफ 67 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य की ओर से की गई उक्त दलील/आश्वासन को ध्यान में रखते हुए शिक्षामित्रों को अगली चयन प्रक्रिया में एक और अवसर दिया जाना चाहिए।

हालांकि कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उस अवसर को किस तरीके और किन व्यवस्थाओं के माध्यम से दिया जाएगा, इसकी मॉडेलिटी और प्रक्रिया राज्य सरकार के विवेक पर छोड़ी जाती है।

यहीं से वर्तमान 11,508 भर्ती को लेकर सबसे बड़ा कानूनी सवाल पैदा होता है।


क्या यह शिक्षामित्रों का तीसरा मौका माना जाएगा?

सुप्रीम कोर्ट के सामने रिकॉर्ड में यह बात भी मौजूद है कि 2017 के बाद शिक्षामित्रों को दो लगातार शिक्षक भर्ती परीक्षाओं में भारांक का लाभ दिया गया था।

उत्तर प्रदेश के नियमों में भी प्रावधान किया गया था कि बेसिक शिक्षा परिषद के जूनियर बेसिक स्कूलों में कार्यरत शिक्षामित्रों को सहायक अध्यापक भर्ती में दो लगातार Assistant Teacher Recruitment Examinations में भारांक दिया जाएगा।

बाद की न्यायिक कार्यवाही में 2019 की भर्ती को इन दो भर्तियों में दूसरी और अंतिम भर्ती के रूप में भी संदर्भित किया गया।

इसके बाद राम शरण मौर्य मामले में राज्य सरकार ने स्वयं सुप्रीम कोर्ट के सामने एक और अवसर देने की बात कही और सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम फैसले के पैराग्राफ 67 में उसी आधार पर अगली चयन प्रक्रिया में एक और अवसर दिए जाने की बात कही।

इसलिए आज शिक्षामित्रों के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि:

क्या 11,508 पदों की वर्तमान भर्ती वही अगली चयन प्रक्रिया है, जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट के सामने राज्य सरकार ने एक और अवसर देने की बात कही थी?


सबसे महत्वपूर्ण बात—सिर्फ परीक्षा का मौका या भारांक भी?

यहां एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है।

सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश में शिक्षामित्रों के लिए अगली दो भर्तियों के संदर्भ में दो अलग-अलग बातें सामने आती हैं—

  1. भर्ती में शामिल होने का अवसर
  2. अनुभव के आधार पर उचित भारांक

Anand Kumar Yadav फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा था कि शिक्षामित्रों को अगले दो लगातार भर्ती अवसरों में विचार किया जाए और उन्हें अनुभव के लिए कुछ भारांक दिया जा सकता है।

इसी आधार पर बाद में नियमों में शिक्षामित्रों के अनुभव के लिए प्रति पूर्ण सेवा वर्ष 2.5 अंक और अधिकतम 25 अंक तक भारांक का प्रावधान किया गया था।

बाद में नियमों में शिक्षामित्रों के लिए दो लगातार भर्ती परीक्षाओं में भारांक का प्रावधान भी दर्ज हुआ।


अब 11,508 भर्ती में क्यों उठ रहा है विवाद?

वर्तमान 11,508 प्राथमिक शिक्षक भर्ती में शिक्षामित्रों को आवेदन के लिए आयु संबंधी राहत का उल्लेख तो है, लेकिन भारांक का उल्लेख नहीं होने की बात सामने आई है।

यहीं से शिक्षामित्रों का सवाल शुरू होता है—

अगर सुप्रीम कोर्ट के सामने राज्य सरकार ने एक और मौका देने की बात कही थी और सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने अंतिम फैसले में अगली चयन प्रक्रिया में एक और अवसर दिए जाने की बात कही थी, तो उस अवसर का वास्तविक स्वरूप क्या होगा?

क्या केवल आवेदन करने और परीक्षा में शामिल होने का मौका ही पर्याप्त माना जाएगा?

या फिर शिक्षामित्र यह भी कह सकते हैं कि उनके अनुभव को चयन प्रक्रिया में किसी रूप में शामिल किया जाना चाहिए?

यही विवाद आने वाले दिनों में महत्वपूर्ण हो सकता है।


क्या भारांक नहीं देने पर सीधे अवमानना हो जाएगी?

यह सबसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील सवाल है।

केवल वर्तमान विज्ञापन में भारांक का उल्लेख नहीं होने से अभी यह कहना सही नहीं होगा कि स्वतः ही सुप्रीम कोर्ट की अवमानना सिद्ध हो गई है।

क्योंकि 18 नवंबर 2020 के फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अगली चयन प्रक्रिया में एक और अवसर दिए जाने की बात कही, लेकिन उस अवसर की मॉडेलिटी और प्रक्रिया तय करने का अधिकार राज्य सरकार के विवेक पर छोड़ा था।

इसलिए असली कानूनी सवाल यह होगा कि—

वर्तमान 11,508 भर्ती को क्या सुप्रीम कोर्ट के आदेश में बताए गए "next selection" के रूप में माना जाएगा और यदि हां, तो उस अवसर को लागू करने के लिए राज्य सरकार द्वारा कौन-सी प्रक्रिया अपनाई गई है?

यदि शिक्षामित्र पक्ष यह स्थापित करता है कि वर्तमान भर्ती वही चयन प्रक्रिया है जिसमें सुप्रीम कोर्ट के आदेश/सरकार के आश्वासन के अनुसार उन्हें अवसर दिया जाना था और आदेश की आवश्यक शर्तों का पालन नहीं हुआ, तब अवमानना या अनुपालन को लेकर न्यायालय के सामने प्रश्न उठ सकता है।

लेकिन अंतिम रूप से यह कोर्ट ही तय करेगा, न कि केवल किसी समाचार या संगठन के दावे से यह स्वतः तय हो जाएगा।


शिक्षामित्रों के लिए असली लड़ाई अब क्या है?

आज शिक्षामित्रों के सामने सिर्फ 11,508 पदों पर आवेदन करने का सवाल नहीं है।

असल सवाल यह है कि वर्षों तक शिक्षण कार्य करने वाले शिक्षामित्रों के अनुभव को इस भर्ती में किस प्रकार मान्यता दी जाएगी।

सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में यह भी दर्ज है कि शिक्षामित्रों के अनुभव को भारांक देने का प्रावधान पहले नियमों में किया गया था।

यही कारण है कि 11,508 भर्ती में भारांक का उल्लेख न होने से यह मुद्दा केवल एक सामान्य भर्ती नियम का मामला नहीं रह गया है, बल्कि पुराने सुप्रीम कोर्ट के आदेश, राज्य सरकार के आश्वासन और वर्तमान भर्ती प्रक्रिया के बीच सामंजस्य का प्रश्न बन गया है।


आगे क्या हो सकता है?

अब शिक्षामित्र संगठनों और अभ्यर्थियों की नजर मुख्य रूप से तीन बातों पर रहेगी—

पहली: क्या सरकार 11,508 भर्ती में शिक्षामित्रों के अनुभव के आधार पर भारांक को लेकर कोई स्पष्टीकरण या संशोधन जारी करती है?

दूसरी: क्या शिक्षामित्र संगठन इस मुद्दे को न्यायालय के सामने ले जाते हैं?

तीसरी: यदि मामला न्यायालय में जाता है तो अदालत यह देख सकती है कि 18 नवंबर 2020 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में दिए गए "one more opportunity" का वर्तमान भर्ती से क्या संबंध है और राज्य सरकार ने उस आदेश का किस प्रकार अनुपालन किया है।


निष्कर्ष

शिक्षामित्रों के लिए यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के रिकॉर्ड में एक तरफ अगली चयन प्रक्रिया में एक और अवसर देने का राज्य सरकार का आश्वासन मौजूद है, वहीं अंतिम फैसले में भी कोर्ट ने उस आश्वासन के अनुरूप अगली चयन प्रक्रिया में एक और अवसर दिए जाने की बात कही है।

दूसरी तरफ, वर्तमान 11,508 प्राथमिक शिक्षक भर्ती में भारांक का उल्लेख नहीं होने से शिक्षामित्रों के बीच यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या उनका अनुभव इस भर्ती में भी चयन प्रक्रिया का हिस्सा बनेगा या नहीं।

इसलिए फिलहाल सबसे सटीक बात यही है कि 11,508 भर्ती में भारांक को लेकर कानूनी सवाल जरूर खड़ा हो गया है, लेकिन इसे अभी से निश्चित रूप से "अवमानना सिद्ध" कहना उचित नहीं होगा। इसका अंतिम निर्धारण भर्ती के लागू नियमों, 2020 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश और यदि मामला न्यायालय में जाता है तो अदालत की व्याख्या पर निर्भर करेगा।

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